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फुलवा नहीं रही ..

By   /  May 16, 2013  /  4 Comments

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lado

वो हर रोज आता
कभी सड़क पर मेरे आँचल को खींचता
कभी सरेआम दुपट्टे को ले भागता
मैं रहती डरी सहमी
अपने आप में घुट्टी
सोचती क्या बोलूं
किस्से बोलूं
कोन सुने ये हाल मेरा
चुप रही आगे बढती रही
मानो जीवन एक चोराहे पर आ बट गयी हो
पर जब देखती माँ बाबु को सोचती कुछ बनू
इनके सपने का नूर
बन चमकू
वो गर्मी की दुपहरीया थी
कंधे पर स्कूल का बस्ता
हांथो पे कच्ची इमली थी
…..
फिर  वो दिखा
मैं सहम गयी
और अचानक
मैं काँप गयी
धरती पर मैं गिरी
फिर कभी न उठी
आँखों में कई सपने
कभी बेटी
कहीं बहन
किसी की पत्नी
पर कुछ नहीं हो पाया
हैं वो दुपट्टा पड़ा है ..
बन घूँघट समाज
के हैवानियत को ढके

मुझ पर तेज़ाब डाला गया
क्या भूल थी मेरी
बस एक लड़की होना ?
मात्र या …ऑंखें भर आयी और उसके आँखों
से गिरते वो तेजाब मुझे जला गयी ..
फुलवा बन सकती थी बेटी
पर आज अर्थी पर सज जा रही है
नहीं रही फुलवा ..जला दिया तुमने उसकी यादों को …क्या बोलूं ..

 
.. (ये कोई कविता नहीं है बस दर्द है किसी और का मैं शब्दों में उसे बांध नहीं पाया मैं नहीं कर सकता ..किसी की पीड़ा को नहीं बांध सकता )

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About the author

A Financial Consultant based in Delhi

  • awesome man

  • I am speechless …

  • Mr. F

    Nice Read!!

    Likhte rahiye.. kaafi gehrayi hai!!

    • EternalRebel

      Thanks !

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