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मंटो के लिए ..

By   /  May 12, 2013  /  5 Comments

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Manto

मंटो …एक कश्मीरी, एक पाकिस्तानी या सिर्फ एक कलम, जिसने अपने समय से आगे जाकर वो लिख डाला जो आने वाली सदी के लिए बीते हुए पल का मात्र एक दस्तावेज ही नहीं सब कुछ हो ..”मंटो ” का मतलब होता क्या है ? इसका जिक्र मंटो ने अपने ही शब्दों में बड़ा खूब लिखा है। मंटो कहते हैं “मंटो का मतलब होता है मन्ट यानि ढेर शेर का पट्ठा ” कितने बेबाक थे वो ..लोग कहते हैं वो एक महान कथाकार था। कल उनकी साल गिराह थी और हर साल ११ मई को यही  सोचता हूँ मंटो आज होता तो क्या लिखता, क्या कहता कुछ मंटो की कलम से ..

मैं क्यों लिखता हूँ?

मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ… मैं क्यों पीता हूँ… लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए खर्च करने पड़ते हैं और जब लिखता हूँ तो मुझे नकदी की सूरत में कुछ खर्च करना नहीं पड़ता। पर जब गहराई में जाता हूँ तो पता चलता है कि यह बात ग़लत है इसलिए कि मैं रुपए के बलबूते पर ही लिखता हूँ।अगर मुझे खाना-पीना न मिले तो ज़ाहिर है कि मेरे अंग इस हालत में नहीं होंगे कि मैं कलम हाथ में पकड़ सकूँ। हो सकता है, फ़ाकाकशी की हालत में दिमाग चलता रहे, मगर हाथ का चलना तो ज़रूरी है। हाथ न चले तो ज़बान ही चलनी चाहिए। यह कितनी बड़ी ट्रेजडी है कि इनसान खाए-पिए बग़ैर कुछ भी नहीं कर सकता। लोग कला को इतना ऊँचा रुतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें असमान से मिला देते हैं। मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज है?

मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है। मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ। रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मालूम होता है, लेकिन क्या किया जाए कि ख़ुदाबंद ताला को यही मंज़ूर है। वह ख़ुद को हर चीज़ से निरपेक्ष कहता है, यह गलत है। वह निरपेक्ष हरगिज नहीं है। उसको इबादत चाहिए। और इबादत बड़ी ही नर्म और नाज़ुक रोटी है बल्कि यूँ कहिए, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है।

मैं अफ़साना क्यों कर लिखता हूँ?

मैं अफ़साना नहीं लिखता, हकीकत यह है कि अफ़साना मुझे लिखता है. मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ. यूँ तो मैने 20 से ऊपर किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे अफ़साने लिखे हैं, जिन पर आए दिन मुकद्दमे चलते रहते हैं.

जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ़ सआदत हसन होता हूँ जिसे उर्दू आती है न फ़ारसी, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी.

अफ़साना मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती. मैं अपने दिमाग पर ज़ोर देता हूँ कि कोई अफ़साना निकल आए. कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूंकता रहता हूँ मगर अफ़साना दिमाग से बाहर नहीं निकलता है. आख़िर थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ.

हालाकी मंटो आज भी अमर हैं और वो ढेर शेर का पट्ठा ही सही, समाज को कहीं न कहीं नाप तौल रहे हैं ..सब कुछ या शायद रब के दरबार में बैठे कुछ सुना रहे हों ….

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  • Published: 6 years ago on May 12, 2013
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  • Last Modified: May 12, 2013 @ 2:01 pm
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